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ॐ ईशा वास्यमिदम् सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।

ॐ ईशा वास्यमिदम् सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।

अर्थ-
इस जगत में जीतने भी जड़-चेतन प्राणी हैं वह समस्त परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य जगत में व्याप्त पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे।

ईशा – शक्तिवान द्वारा|
वास्यम् – अवश्य ही बसा जाना चाहिए|
इदं सर्वं – यह सब-कुछ |
यत् किंच – जो कुछ भी|
जगत्यां – संसार में| जगत् – चलायमान वस्तु है|
तेन त्यक्तेन – उस त्यागे हुए से तात्पर्य त्यागते हुए ही|
भुंजीथा – भोग कर|
मा गृधः – चाहत मत कर, लोभ मत कर|
कस्य स्वित् – किसका है|
धनम् – धन

All that exists is meant for the Lord’s habitation, including every individual universe of motion within the grand cosmic dance. By renouncing attachment, one can truly enjoy life without coveting another person’s possessions.